Wanted to write on such a topic from a long tym...
Watching the show "Satyamev Jayate" left me spell bound and here i am with my writing-cum-poem...Hope you like this...
" कुछ ऐसी है वो "
Watching the show "Satyamev Jayate" left me spell bound and here i am with my writing-cum-poem...Hope you like this...
" कुछ ऐसी है वो "
इस असीम दुनिया का इक छोटा सा अंग बन्ने जा रही हूँ मैं,
आज अपने दिल की धरकन, सुन पा रही हूँ मैं |
करवट बदलती , कोक में तेरी ,पल रही हूँ मैं,
गर्व महसूस करती कि माँ तेरा अंश हूँ मैं |
तुझमे आज तो हूँ समायी हुई,
कुछ समय में इस सुन्दर जग का हिस्सा बन्ने की ताकत संजो रही हूँ मैं,
फक्र है तुझपे माँ कि इस दुराचारी समाज में रहते हुए बेटी बन आ रही हूँ मैं |
तो आज खोली हैं आंखें उस नन्ही कली ने,
और माँ का स्पर्श लिया हे उसने |
धीरे -धीरे अपने नाज़ुक नन्हे क़दमों से चलने लगी है वो,
पूर्ण समर्पित हो, अपने परिवार की आँखों से,
ये दुनिया देख रही है वो |
खूब नाजों से पल, आज पढ़-लिख स्वतंत्र, स्वनिर्भर हो गयी है वो,
अपने पैरों पर खरी आज कुछ कर दिखाने कि आशा लिए आगे बढ़ रही है वो |
है समय के चक्र के साथ चलना उसे,
सब रिश्ते नातों को छोड़ , अब किसी और की होना है उसे |
आज डोली में बैठ, इक नए सफ़र पर निकलना है उसे,
एक नही, अब दो-दो कुलों कि लाज रखनी है उसे |
आज एक नई ज़िन्दगी जीने जा रही है वो,
जीवनसाथी के हर किरदार को , पूरी शय से निभाने लगी है वो,
आँखों में नमी लिए, खुशियों कि आशा कर रही है वो ||
अब एक नई दुनिया के रंगों में घुल मिल गयी है वो,
एक नई ज़िन्दगी अब इस दुनिया में ला रही है वो |
जननी बन आज एक नये पौधे को सींचने जा रही हे वो,
जीवनदात्री बन जीवन के क्रम को आगे चला रही है वो ||
अपनी ज़िन्दगी सबके लिए जीती आई अब तक,
आज अपने अंश में ही अपना स्वरुप टटोल रही है वो,
खुद गर्मी झेल, अपने सीने की आह कि ठंडक उसे दे रही है वो |
अब जीवनकाल के आखिरी पराव कि ओर बढ़ रही है वो,
संजो रही है आज जीवनभर के हसीन पल वो |
आज हक़ है उसे इस जग कि सब खुशियाँ पाने का,
कभी बेटी, बेहेन, तो कभी पत्नी और माँ बन, सब कुछ निभा; आज खुद के लिए थोडा जीने का ||
पर आज जीवन के अंतिम क्षणों में,
जीवनसाथी का हाथ थामे, किसी गहरी सोच में है वो,
जीवन कि यादों को संजो, आज ख़ुशी से अलविदा कह रही है वो ....||

